श्री कृष्ण पर कविता – बसो मोरे हिरदे में गोपाल | Shri Krishna Par Kavita

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श्री कृष्ण पर कविता ( Shri Krishna Par Kavita ) ” बसो मोरे हिरदे में गोपाल ”

प्रिय पाठकों, मैं आपको बता दूँ कि भक्ति की शक्ति में भी एक अलग ही आनंद है। प्रेम तो केवल इंसान से ही नहीं अपितु भगवान् से भी होता है बल्कि यूँ कहें की जो मन को भा गया उसी से प्रेम हो जाता है। ऐसा ही वर्णन किया गया है इस गीत में गोपियों को भगवान् कृष्ण से प्रेम हो जाता है और अब वो उनकी महिमा का वर्णन करते नहीं थकते और उन्हें अपने हृदय में ही बसने को कह रहे हैं , तो आइये आनंद लेते हैं इस श्री कृष्ण पर कविता का –

श्री कृष्ण पर कविता

श्री कृष्ण पर कविता

बसो मोरे हिरदे में गोपाल।

मोर मुकुट सिर सुन्दर चोटी।
तोरे घून्घर वाले बाल।
बसो मोरे हिरदे में गोपाल।

कमल नयन कजरारी अंखिया।
तोरे गोरे गोरे गाल।
बसो मोरे हिरदे में गोपाल ।

केशर तिलक मोहिनी सूरत।
तोरे गल बैजन्ती माल।
बसो मोरे हिरदे में गोपाल।

कटि पीताम्बर पीत झंगुलिया।
तोरे करधन झूलादार।
बसो मोरे हिरदे में गोपाल।

छम छम पायल चरण पादुका।
तोरे रूप बने मनोहार।
बसो मोरे हिरदे में गोपाल।

अधर धरी अधरा न धरूँगी।
तोरी मुरली करे कमाल।
बसो मोरे हिरदे में गोपाल।

तेरी छवि पे बलि बलि जाऊँ।
ओ प्यारे नंदलाल।
बसो मोरे हिरदे में गोपाल।

कमल पंखुडी से अधर गुलाबी।
तेरी मधुर मधुर मुस्कान ।
बसो मोरे हिरदे मे गोपाल।

दुति दामिनी सी दंत पंक्तिया।
दिल पर करे कुठार।
बसो मोरे हिरदे मे गोपाल ।

ग्वाल बाल सब तुम्हें पुकारे।
आओ माता यशोदा के लाल।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

श्यामा नंदनी खड़ी रभाये।
आओ वंशी धर गोपाल।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

माखन मिश्री दूध मलाई ।
लाला तुमको देऊ खिलाय।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

सोनी सो लल्ला प्यारो सो लल्ला।
तेरी देऊ नजरिया उतार।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

कदम की डार पे वंशी बजाये।
सुने सकल संसार।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

वृंदावन से मथुरा को।
एक न माखन जाय।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

छीन झपट दधि खायके मोहन।
मटकी दे फुडबाय।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

राजा कंस जन्म के दुश्मन।
चोटी से दिये गिराय।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

चंद्र सखी भज बाल कृष्ण छवि।
हरकि हरकि जस गाऊ।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

दामिन के तुम गिरिधर नागर
देखि देखि सुख पाये।
बसो मेरे हृदय में गोपाल ।

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रचनाकार परिचय

मैं सौदामिनी खरे पति स्व0 अशोक खरे।

मैं एक शिक्षिका हूँ रायसेन जिले की निवासी हूँ। हिन्दी साहित्य की सेवा करना अपना सौभाग्य समझती हूँ, सभी रस पर लेखन करना मेरी विधा गीत, गजल, दोहे छंद कविता नज्म आदि है।

अभी तक साझा संकलन, कश्तियो का सफर ,काव्य रंगोली में, तथा मासिक पत्रिका ग्यान सागर मे प्रकाशित हुई है हिन्दी भाषा डाट काम पर भी रचनाऐ प्रकाशित हुई है,नव सृजन कल्याण समिति की फाउन्डर मेम्बर मे मीडिया प्रभारी हूँ ।

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