तन्हाई पर कविता :- ये रात की तन्हाइयां कहती है

तन्हाई पर कविता ( Tanhai Par Kavita ) :- जीवन में प्रेम का अपना अलग स्थान और महत्व है , किन्तु जब प्यार में बिछड़ना नसीब में होता है तो लगता है की जैसे जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो गया हो। फिर हमारे साथ लाखों की भीड़ होने के बावजूद भी हम खुद को अकेला महसूस करते हैं। और हमारे साथ हर वक़्त अपने साथी ख्याल उसकी यादें और बस तन्हाई रह जाती है। तो आईये पढ़ते हैं सौदामिनी खारे जी की कविता –

तन्हाई पर कविता

तन्हाई पर कविता

ये रात की तन्हाइयां कहती हैं
मुझसे कुछ सुन।
ये मौसमें परछाईयां कहती है
जरा तू सुन।
ये तो यादों स्वपनिल साये है।
दूर दूर से आए है।
रोशन चेहरो के साये है
जरा तू आकर सुन।
ये रात की तन्हाइयां कहती हैं।

ये तो मेरे ही मन मीत है ।
छूटे हुए से गीत है ।
प्रेम के माधुर्य का सुन्दर संगीत है
जरा तू आकर गुन।
ये रात की तन्हाइयां कहती है

ये मेरी चाहत की दीवानगी है
और दर्दे नासूर है।
उठते हुए इस दर्द की आहें हैं
तू जरा तो सुन ।
ये रात की तन्हाइयां कहती हैं।

ये तो बन गये मेरे बिरले सजन है।
और लेखनी मे आए है ।
कोई छंद है कोई गीतहै।
कोई शब्द प्रवाह की धुन
तू जरा तो आकर सुन।
ये रात की तन्हाइयां कहती हैं।

ये तो मेरे हमसफर है।
और मेरे साज है।
ये मेरी तन्हाइयां और
ये मेरे साहिल है
तू जरा तो आकर सुन।
ये रात की तन्हाइयां कहती हैं।

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रचनाकार परिचय

तन्हाई पर कविता :- ये रात की तन्हाइयां कहती है

मैं सौदामिनी खरे पति स्व0अशोक खरे।

मैं एक शिक्षिका हूँ रायसेन जिले की निवासी हूँ। हिन्दी साहित्य की सेवा करना अपना सौभाग्य समझती हूँ, सभी रस पर लेखन करना मेरी विधा गीत, गजल, दोहे छंद कविता नज्म आदि है।

अभी तक साझा संकलन, कश्तियो का सफर ,काव्य रंगोली में, तथा मासिक पत्रिका ग्यान सागर मे प्रकाशित हुई है हिन्दी भाषा डाट काम पर भी रचनाऐ प्रकाशित हुई है,नव सृजन कल्याण समिति की फाउन्डर मेम्बर मे मीडिया प्रभारी हूँ ।

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