ट्रेन जैसी हो गई है ज़िंदगी | Train Jaisi Ho Gayi Zindagi

आप पढ़ रहे हैं हिंदी कविता ट्रेन जैसी हो गई है ज़िंदगी :-

ट्रेन जैसी हो गई है ज़िंदगी

ट्रेन जैसी हो गई है ज़िंदगी

सच ही कहा है ज़िंदगी
ट्रेन की तरह है
हर सुबह चल पड़ती
भाग दौड़ की दौड़ में
कुछ सपनो को लिए
कुछ अपनो को लिए
तो कुछ चाहतों में जीने के लिए

जैसे ट्रेन हर स्टेशन से गुज़रती है
मानो ज़िंदगी भी हर सुख दुःख के
स्टेशन से गुजरती है
बस फ़र्क़ इतना है कि स्टेशन कभी
कभी जल्दी आ जाता है पर आ जाता ज़रूर है

पर यहाँ मंज़िल कभी नही आती
कभी किसी के इंतेज़ार में
वेटिंग लिस्ट में रह जाते है
तो कभी कभी टिकट नही मिलती ।
तभी सच कहा है ज़िंदगी ट्रेन की तरह है।

जैसे ट्रेन की सीट तब तक अपनी नही होती
तब तक कन्फ़र्म ना हो
वैसे ही ज़िंदगी में जब तक कोई अपना नही होता
तब तक कोई कन्फ़र्म न हो
या उसपे कोई मोहर ना छपे
क्योंकि यहाँ सिर्फ़ खून के रिश्तों
को ही अहमियत दी जाती है
फिर उन्ही का खून किया जाता है

सच ही कहा ज़िंदगी ट्रेन की तरह है
कभी भी पलट सकती है
कभी भी रुक सकती है
कभी भी पटरी से उतर सकती है
आज कल लोग ट्रेन की तरह है

बहुत सारे विकल्प चुनते है
ये ट्रेन नही तो ये सही
ये नही तो वो ही सही
बस चलना है
फिर कोई भी हो साथ ।


रचनाकार का परिचय

रूचि

यह कविता हमें भेजी है रुचि जी ने दिल्ली से।

“ ट्रेन जैसी हो गई है ज़िंदगी ” ( Train Jaisi Ho Gayi Zindagi ) के बारे में कृपया अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। जिससे रचनाकार का हौसला और सम्मान बढ़ाया जा सके और हमें उनकी और रचनाएँ पढ़ने का मौका मिले।

यदि आप भी रखते हैं लिखने का हुनर और चाहते हैं कि आपकी रचनाएँ हमारे ब्लॉग के जरिये लोगों तक पहुंचे तो लिख भेजिए अपनी रचनाएँ hindipyala@gmail.com पर या फिर हमारे व्हाट्सएप्प नंबर 9115672434 पर।

हम करेंगे आपकी प्रतिभाओं का सम्मान और देंगे आपको एक नया मंच।

धन्यवाद।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published.