बमो का आध्यात्मिक स्वर
बम गिरे स्कूलों पर
यूनिफार्म और टिफिन पर
शिथिल पड़ गए स्कूल
लंबे अंतराल के बाद
मिली सुकून भरी छुट्टी
बम गिरे जलसों पर
खून से सने नारों पर
जलसा हुआ ज़मींदोज़
प्राणों का मर्सिया
पढ़ रहा ऑर्केस्ट्रा
बम गिरे घरों पर
धूप सेकते गीले कपड़ों पर
बिखर गए घर
मकानों को घर कहा गया
मकीनों को लावारिस वस्तु
बम गिरे लबो पर
नज़रों में छुपे इश्क़ पर
किए लाल दस्तख़त
झीने सफेद रूमाल पर
बम गिरे मोहब्बत पर
छिन्न भिन्न हुए स्वप्न
उदास कॉफ़ी हाउस
में रखे कॉफ़ी मग
गिरे ..टूटे
बम गिरे हुक्मरानों पर ..
हुकूमत ना हिली पर
सरहद पर पहुँच रहे
फ़ौजियों के दस्ते
कफ़नो की गिनती करते
नहीं थक रहे लोग
ठहाका लगा रहे
न्यूज़ रूम पर बैठे विदूषक
बम गिरे तीज त्योहारों पर
सेवइयों और बर्फ़ियों पर
इस ईद पर यही मुफीद लगा
बहुत हुआ एहतराम
घोल के ज़हरीली चाशनी में अब
पीठ में खंजर घोंपा जाए
वतन परस्ती और है भी क्या
मुल्क मिटा रहे मुल्कों को
शहंशाह गले उतार रहे शहंशाहों के
ख़िलक़त की पेशानी पर
यही लिखा है
बम गिरे नसीबों पर ..
– शशांक शेखर
रचनाकार का परिचय

मेरा नाम शशांक शेखर है, मैं मिर्ज़ापुर का रहने वाला हूँ, मेरी उम्र 35 वर्ष है। यहाँ दिल्ली यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान से स्नातक की पढ़ायी करने के बाद यहीं के विधि संकाय से एल.एल.बी की पढ़ायी पूरी की। फिर यहाँ क़रीब दस साल से सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहा हूँ। साल 2017 में एडवोकेट ऑन रेकोर्ड की परीक्षा निकाली जिसके बाद यहाँ बहस करने का अधिकार प्राप्त हुआ।
कॉलेज के दिनों से कविताओं में दिलचस्पी रही , रिल्के, नेरुदा , मुक्तिबोध , अज्ञेय, फ़ैज़ , गुलज़ार की कविताओं ने प्रभावित किया । सौ से ज़्यादा कविताएँ लिख चुका हूँ । और आगे भी लिखना जारी है ।
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