धरती बचाओ पर कविता – वसुधा ने संपर्क किया | Dharti Bachao Par Kavita

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धरती बचाओ पर कविता

धरती बचाओ पर कविता

वसुधा ने संपर्क किया नभ से
मानव बने प्रकृति के भक्षक हैं,
ह्रदय से आग्रह है तुमसे
आगमन करो आप सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हैं।

उड़ने वाले खग अम्बर से
अनमोल संदेशा लाए हैं,
मानव वृक्षों को काट काट
धरा पे संकट बन कर छाये हैं।

पहचानो संकेत प्रलय का
प्रकृति का ना करो अपमान,
पर्यावरण के रक्षक बनकर
बढ़ाओ स्वयं का स्वाभिमान।

नन्हें पुष्पों के पौधों का तुम
आज लगाओ उत्तम उद्यान,
पवन की हर एक लहर में
निहित है मानव की जान।

धरा गन्दी हवा स्वयं ले लेती
शीतल वायु तुम्हें करती प्रदान,
प्यारा सा एक विटप लगाकर
हृदय से करो  उसका सम्मान।

किसानों का जो बनी सहारा
अपने आंचल में दिया स्थान,
मनुष्य की हर परिस्थिति में
बिना भेदभाव करती समाधान।

अनाज से भरा भंडार तुम्हारा
आशीष दिया खेत, खलिहान को,
अपनी चंचल धारा से तुमने
व्यथा मुक्त किया रेगिस्तान को।

रैन बसेरों से वंचित होकर
नभसुत विहंग हुए परेशान,
बिन वृक्षों के खग हुए अनाथ
इसका कारण बस है इन्सान।

अब अपना भी कर्तव्य निभाये
चलो एक वृक्ष करते हैं दान,
यही आधार हमारे जीवन का
ऐसा करके चलो बने महान।

पढ़िए :- पर्यावरण दिवस पर कविता “न जाने इस धरती का”


नमस्कार प्रिय मित्रों,

सूरज कुमार

मेरा नाम सूरज कुरैचया है और मैं उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के सिंहपुरा गांव का रहने वाला एक छोटा सा कवि हूँ। बचपन से ही मुझे कविताएं लिखने का शौक है तथा मैं अपनी सकारात्मक सोच के माध्यम से अपने देश और समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जिससे समाज में मेरी कविताओं के माध्यम से मेरे शब्दों के माध्यम से बदलाव आए।

क्योंकि मेरा मानना है आज तक दुनिया में जितने भी बदलाव आए हैं वह अच्छी सोच तथा विचारों के माध्यम से ही आए हैं अगर हमें कुछ बदलना है तो हमें अपने विचारों को अपने शब्दों को जरूर बदलना होगा तभी हम दुनिया में हो सब कुछ बदल सकते हैं जो बदलना चाहते हैं।

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