हिंदी कविता : कहो रघुवीर | Hindi Kavita Kaho Raghuveer

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हिंदी कविता : कहो रघुवीर  ( Hindi Kavita Kaho Raghuveer ) :- जब श्री राम ने सुग्रीव के भाई बाली का वध किया। उस समय बाली ने श्री राम से उन्हें छिप कर मारने का कारण पूछा। उस समय भगवान् राम और बाली के बीच जो संवाद हुआ उसे हरीश चमोली जी प्रस्तुत कर रहे हैं इस बेहतरीन कविता के जरिये। आइये पढ़ते हैं :-

हिंदी कविता : कहो रघुवीर

हिंदी कविता : कहो रघुवीर

कहो रघुवीर! क्या था पाप मेरा?
बाणों ने तुम्हारे क्यूँ मुझको घेरा?
घायल,हताश पड़ा निर्दोष हूँ मैं,
कहो!क्यूँ आ पड़ा यम का फेरा?

अनुज सुग्रीव था दुश्मन मेरा।
किष्किंधा राज का सर्व धन मेरा।
मैं हूँ बलशाली अधिक अनुज से,
चलो राम! अब करो मंथन मेरा।

सुग्रीव से क्या है लिया तुमने? जो,
किष्किंधा पुरस्कार में दिया तुमने।
मुझ निर्दोष,निर्विकार,वीर पर ही,
फिर क्यूँ है ये पाप किया तुमने?

हे रघुवंशी! क्यूँ मर्यादाहीन हुए?
कापुरुष सा छिपकर घात किए।
हे पाखंडी!दो उत्तर प्रश्नों के मेरे,
क्यूँ बेवजह ही मेरे प्राण लिए?

बाली का आक्रोश सहे राम फिर।
सुनकर खरी चुप न रहे राम फिर।
बहुत सुन ली खरी खोटीयाँ बाली,
भर अधरों पर मुश्कान,कहे राम फिर।

हे!महा बलशाली वानर राज बाली।
किस तरह तुमने किष्किंधा संभाली?
अहंकार मद में चूर होकर तो तुमने
अपने ही वृक्ष की शाख काट डाली।

मृत्यु सैय्या पर आकर ये अब तुम।
कहो!किस धर्म की बातें कर रहे हो?
अन्विज्ञ हो धर्मज्ञान से,कोषों दूर अभी।
सत्य का सामना करने से डर रहे हो।

जीतेजी तो न पाल सका तू धर्म को ।
इसलिए जान न पाया जीवन मर्म को।
हिंसा,अधर्म,अनैतिक मार्ग पर जाकर,
क्यूँ भूला गया तू पौरुष के कर्म को।

हरकर प्रभु तम बाली के मन का।
दीप जलाया फिर धर्म ज्ञान का।
दिया जबाब हर प्रश्न का बाली को
था यह प्रश्न रघुकुल सम्मान का।

रखकर शीश श्री राम चरणों में,
मलिन किया जींवन दुष्कर्मों में।
स्वीकार कर रुदन किया बाली ने,
संलग्न रहा नित सदा अधर्मों में।

फिर देख दशा बाली की श्री राम।
भावुक हुए,देख उसका अंजाम।
कहे प्राण दान दे सकते हैं तुम्हें,
यह तुम्हारे पश्चाताप का परिणाम।

क्रंदन कर रहे बाली ने फिर कहा।
हे रघुवर,जींवन मेरा अधर्मी रहा।
मैं अबोध,नादान,अज्ञानी बड़ा हूँ,
जो साक्षात आपको न जान सका।

जींवन-मरण तो चलता रहेगा।
आपका बाण फिर न लगेगा।
जींवन तो बहुत जी लिया है किंतु,
प्रभु चरणों में मरण न फिर मिलेगा।

पढ़िए :- भगवान् राम पर कविता “श्री राम कहलाते”


हरीश चमोली

मेरा नाम हरीश चमोली है और मैं उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल जिले का रहें वाला एक छोटा सा कवि ह्रदयी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे लिखने का शौक है और मैं अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

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Image Credit :- Punjab Kesari

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