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कविता मन की आँखों से

कविता मन की आँखों से

गुमनाम गलियों में गीत बहारों के गाते हैं
पतझड़ में भी फूल हर डाली पे खिलाते हैं ।

मन की आंखो से सुंदर सा ख्वाब सजाया है
गम की काली बदली में खुशियों का फूल खिलाया है

जून की तपती दोपहरी में शिमला का रंग अपनाया है
धूप मिली छाव मिली हर पल कदम बढ़ाया है

सर्द जनवरी भी हमने तपती धूप सा पांव जलाया है
वो दिन भी याद मुझे जब आंखो से सागर बरसाया है

फूलों में हर पल चुभते कांटे सा दर्द समाया है
बिखरे अरमानों को सिमटा कर जीवन पथ अपनाया है

अंधेरी गलियों से भी चुन चुन कंटक उठाया है
आंखे हर पल राह निहारे कैसी दस्तक कैसा साया है ।

पढ़िए :- हिंदी कविता अजनबी बनकर


रचनाकार कर परिचय :-

अवस्थी कल्पनानाम – अवस्थी कल्पना
पता – इंद्रलोक हाइड्रिल कॉलोनी , कृष्णा नगर , लखनऊ
शिक्षा – एम. ए . बीएड . एम. एड

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