Prabhat Kavita | हिन्दी कविता प्रभात | ब्रह्म मुहूर्त की बेला में

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ब्रह्म मुहूर्त की बेला में,
कविता रची प्रभात।
शीतलहर,तीखी ठंड,
कर रही सीधा आघात।

शांत पड़ा है शहर,
दुबके पड़े है सब मंद।
कोहरा छा रहा है,
पड़ रही है तेज धूंध।

मंदिर का सुन टंकारा,
सबने ली है करवट।
पर नही छुट पा रहा,
सर्दी में बिस्तर झटपट।

भजन कीर्तन सुन,
मन में जगा उल्लास।
सूर्य देव की किरणों की,
प्रभात में सबको है आश।

किरणों से छटी है ओस,
कुंज में खिली है कली।
कलरव का सुन सरगम,
रस पीने आ गया अली। 

खिले फूल, महकी प्रकृति,
देती है प्रेम की सौगात।
करे रोज नया सृजन,
नई उर्जा देता है प्रभात।

रोज नए जीवन का,
आभास कराता है प्रभात।
पश्चाताप, ग्लानी को भूल,
करनी चाहिए नई शुरुआत।

प्रभात में रोज देव की,
होती है आरती मंगला।
रोज करे देव दर्शन,
कभी नही होंगे कंगला।

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रचनाकार का परिचय

हंसराज "हंस"

हंसराज “हंस” जी गत 30 वर्षो से अध्यापन का कार्य करवा रहे है। शिक्षा मे नवाचारों के पक्षधर है। “हैप्पी बर्थडे” “गांव का अखबार” इनके शैक्षिक नवाचार है। शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाओं में संदर्भ व्यक्ति ( रिसोर्स पर्सन ) के रूप में 8-10 वर्षों का अनुभव रखते है। तात्कालिक मुद्दों, जयंतियों व सामाजिक कुरीतियों पर आलेख लिखते रहते।

मौलिक लेख विभिन्न सामाजिक, धार्मिक व देश व प्रदेश की पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। इसके साथ ही न्यूज पोर्टल व सोशल मीडिया के माध्यम से भी कई वेबीनारो व फेसबुक लाइव प्रसारण पर विभिन्न मंचों के माध्यम से अपने मौलिक विचारों का प्रकटीकरण करते रहते है। शिक्षक संगठन व सामाजिक संगठनों में विभिन्न दायित्वों का निर्वाह करते हुए निरंतर सामाजिक सुधारों की ओर अग्रसर है।

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