संगीत पर कविता | Sangeet Par Kavita

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संगीत पर कविता

संगीत पर कविता

सरहदों में बंध जाए
वह संगीत ही क्या!
भाषाओं की बेड़ियां
जकड़ ले वो गीत ही क्या!

संगीत किसी संस्कृति सभ्यता में
कैद हो जाए…
असंभव है।

कौन बांध पाया है
नदियों की कल -कल को?
कौन रोक पाया है
चिड़ियों के कलरव को?

हवा की गुदगुदी से पत्तों की हंसी…
भला कौन छीन पाया है!

संगीत साक्षात परब्रह्म है
साधन है परमानंद का..।

पुराणों, श्रुतियों से
बहता -बहता माधुर्य रस का पान कराता..
किसी ना किसी रूप में
जन-जन तक पहुंच ही जाता हैं।

संगीत की अपनी ही भाषा हैं
शब्द समझ में न भी आए
तब भी उसकी मिठास
मिश्री सी कानों में घुल…
गुनगुनाने पर मजबूर कर देती है ‌।

झांझ,सुषिर, फूंक वाद्य
व अन्य वाद्य यंत्र झंकृत कर देते हैं ह्रदय को‌,
मधुर संगीत कानों में नाद बन सुनाई देता है।

स्वर तो आखिर वही सात ..
ठाट बन ठाठ से जन्म देते हैं
नए-नए रागों को..
अलग-अलग भाव जगाते अलंकारों से।

मोहनी विद्या है संगीत
जिसमें एक अक्खड़ स्वर”प” भी है ..
कितने भी स्वर इधर से उधर बह जाए मगर
“प” नहीं हिलेगा।

कभी शुद्ध कभी तीव्र में बदलकर
बाकी स्वर नई नयी- नयी
स्वर लहरियों को जन्म देते रहते हैं।

इतनी खूबसूरती है संगीत में
शायद ही कोई इस मोहनी से बच पाया होगा।

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रचनाकार का परिचय

निमिषा सिंघल

नाम : निमिषा सिंघल
शिक्षा : एमएससी, बी.एड,एम.फिल, प्रवीण (शास्त्रीय संगीत)
निवास: 46, लाजपत कुंज-1, आगरा

निमिषा जी का एक कविता संग्रह, व अनेक सांझा काव्य संग्रहों में रचनाएं प्रकाशित हैं। इसके साथ ही अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं की वेबसाइट पर कविताएं प्रकाशित होती रहती हैं।

उनकी रचनाओं के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया है जिनमे अमृता प्रीतम स्मृति कवयित्री सम्मान, बागेश्वरी साहित्य सम्मान, सुमित्रानंदन पंत स्मृति सम्मान सहित कई अन्य पुरुस्कार भी हैं।

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