विश्व पर्यावरण दिवस पर हिंदी कविता :- कटते जंगल | 5 जून पर विशेष कविता

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विश्व पर्यावरण दिवस पर हिंदी कविता

विश्व पर्यावरण दिवस पर हिंदी कविता

धरती की हरियाली को तूने लूटा है,
बताओ कितने जंगल को तूने काटा हैं!

वनो में अब न गुलमोर न गूलर खड़ी है,
हरी- भरी धरती हमारी बंजर पड़ी है!

क्या खाओगे बोलो और क्या साँस लोगे!
अगर ये जंगल नहीं रहेगा तो तुम भी कहाँ रहोगे!

जहर स्वयं पीती हैं पेड़,
और अमृत भी देती है पेड़!

फिर भी तूने यह जानकर,
अपनी स्वार्थ में आकर!

ये कैसा अनिष्ठ कर दिया,
पेड़ों को नष्ट कर दिया!

अगर ये जंगल नहीं रहेगा,
तो ये जीव-जन्तु कहाँ रहेगा!

तूने अपना महल बनाकर उनका घर उजाड़ा हैं,
फिर प्रकृति का संतुलन बिगाड़ा हैं,

अपनी ही हाथो से अपनी ही अर्थी निकाली हैं,
तूने अपनी ही जीवन को संकट में डाली है,

तुम रक्षक नहीं भक्षक बन बैठे हो,
इन्हीं पेड़ों को तुम नष्ट कर बैठे हो,

जिसने तुम्हे जीने के लिए जीवन दिया,
साँस लेने के लिए पवन दिया,

खाने के लिए तुम्हें अन्न दिया,
और बहुत सारा ईंधन दिया,

उसी को आज तूने क्या किया,
कुल्हाड़ी से उन पर वार किया,

जंगल से जीवों को निष्कासित किया,
उस पर कारखाने स्थापित किया,

आज इसलिए समस्या बढ़ रही हैं,
प्रकृति में जो परिवर्तन हो रही हैं,

कहीं बाढ़ तो कहीं ग्लेश्यिर का पिघलना,
कहीं सूखा तो कहीं जलस्तर का बढ़ना,

कहीं चक्रवात तो कही तूफान,
ले रही है अनेकों जान।

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बिसेन कुमार यादव

यह कविता हमें भेजी है बिसेन कुमार यादव जी ने गाँव-दोन्देकला, रायपुर, छत्तीसगढ़ से।

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