हिंदी कविता रक्त उबलते देख रहा हूँ | Kavita Rakt Ubalte

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वर्ष 2021, गणतंत्र दिवस के मौके पर उपद्रवियों द्वारा लाल किले पर अभद्रता और हुड़दंग मचाने की घटना की कवि हृदय से भर्त्सना करती हुयी हिंदी कविता रक्त उबलते देख रहा हूँ :-

हिंदी कविता रक्त उबलते देख रहा हूँ

हिंदी कविता रक्त उबलते देख रहा हूँ

लाल किले की चिर प्राचीर के रक्त उबलते देख रहा हूँ ।।
रक्तिम सी संघर्ष शिखा की ज्वाल मचलते देख रहा हूँ ।।

उर्ध्व शिखर पर गुमान भरकर जहाँ तिरंगा फहर रहा,
देशद्रोहियों की छाती पर काले घन सा घहर रहा,
राष्ट्र धरोहर के अभिनंदन वन्दन का सिरमौर है जो,
देशप्रेमियों के दिल की धड़कन का पावन ठौर है जो,
जहाँ संचरित होते हैं गणतंत्र दिवस के मंत्र विशेष,
जहाँ पुरस्कृत होते रहते शौर्य साधना के संदेश,
जहाँ स्वार्थ परमार्थ में पलकर परहित के भी लिखे प्रमाण,
और देश की अनेकता में एकरूपता का परिधान,
और जहाँ बहुमत के सेवक राजधर्म का रखते मान,
और समूचे देश के सन्मुख उभर के दिखता हिंदुस्तान,
और जहाँ बहुमत के हिम्मत से सहमत है देश महान,
अनुशासन के अनुष्ठान से समाज का होता उत्थान,

वहीं किसान कुछ बहुरूपियों से जवान जलते देख रहा हूँ ।।
लाल किले की चिर प्राचीर से रक्त उबलते देख रहा हूँ ।।

सदियों से जो अधिकारों में जीत हार को देखा है,
राजतंत्र से प्रजातंत्र तक की सरकार को देखा है,
कितने परचम परम प्रतापी निखर निखर के बिखर गए,
कालचक्र की कुटिल चाल में गढ़ पे चढ़ के उतर गए,
कितने उदघोषों से हमने अपनों को भी साधा है,
नियम संयम के साधन से दूर भगाई बाधा है,
धैर्य धर्म दिग्भ्रमित दिशा में अपनों को क्या गैर बनाएं,
मतभेदों के ढेर तले अब कहो कहां तक खैर मनायें,
गैर बनाएं या अपनाएं या संयम का परिचय दें,
इस हुड़दंग के गलत ढंग को निर्भय दें या आश्रय दें,
मर्यादा का मन मुरझाये लोकतंत्र की गरिमा जाए,
और करोंड़ो जनमानस का अभीष्ट मन चोटिल हो जाए,

आज तलक जिनमें संबल था उन्हें फिसलते देख रहा हूँ।।
लाल किले की चिर प्राचीर से रक्त उबलते देख रहा हूँ।।

मर्यादा का वादा करके मर्यादा को भूल गए,
अनुशासन को अपमानित कर अहंकार में फूल गए,
गौरव के दिन की गरिमा का मान नहीं रख पाए वो,
संघर्षो में संयम की पहचान नहीं रख पाए वो,
कोलाहल के बल पे छल से आक्रोषित उफान लिए,
उपद्रवी दंगाई आए प्रतिबंधित सामान लिए,
घंटों तक बेशर्मी से वे देश विरोधी काम किये,
दंगों के निर्लज्ज लफंगे किसान को बदनाम किये,
देशद्रोह के कर्म कभी बलवान नही हो सकते हैं,
और भले कुछ हो सकते किसान नही हो सकते हैं,
हुल्लड़बाजी से आहत दिनमान निराशा झेल रहे थे,
मौन शिलाओं के अंचल में यथा व्यथा से खेल रहे थे,

संयम के शीतल चंदन पे व्याल मचलते देख रहा हूँ।।
लाल किले के चिर प्राचीर के रक्त उबलते देख रहा हूँ ।।

सदियां जिसमें समा गई वह लाल किला स्तब्ध रहा,
सत्ता वालों की सत्ता के लिए सतत प्रतिबद्ध रहा,
प्रजातंत्र के मधुर अंक में परिपोषित इतराता था,
जो स्वछन्द सुगंध पलों में फुले नही समाता था,
आज जहॉं पर गौरव गान गुमान का अवसर मिला सुखद,
वहीं बेहुदेपन के कारण घटना घट गई घोर दुखद,
वृत्तपत्र व समाचार चलचित्रों ने मुँह खोल दिया,
अपनों ने अपनों के घर में ही अग्नि जल घोल दिया,
और जलाकर मुखमण्डल वो जग उपहास करातें हैं,
भरत वंश के अरि दल के मन में विश्वास बढ़ाते हैं,
हृदय हमारा भी बोझिल है इन अक्षम्य आघातों से,
मौन रह गए महारथी जो दिल्ली के आहातों से,
कुछ तो कदम उठाए होते मादकता को मथने की,
कृष्ण नीति पढ़ लेते थोड़ा कालिया नाग को नथने की,

सहनशीलता के साए में दुश्मन पलते देख रहा हूँ।।
लाल किले की चिर प्राचीर के रक्त उबलते देख रहा हूँ।।

दुर्योधन यदि केशव के प्रस्ताव को मान लिया होता,
दुखियों की दुख दर्द वेदना थोड़ा जान लिया होता,
तो, ना होता संग्राम समर में ना अनाथ होते बच्चे,
विधवाएं ना क्रन्दन करतीं सम्बन्ध सभी होते अच्छे,
मगर हवा जहरीली हो तो श्वांस स्वच्छ ना मिलती है,
सूर्य शशांक के मृदुल स्नेह बिन कलियाँ कभी न खिलती हैं,
अज्ञानी अभिव्यक्ति ज्ञान की पवित्रता को बांच रहे थे,
मुट्ठी भर चूहे सिंहो के सिर पे चढ़कर नाच रहे थे,
खेत और खलिहान के सेवक आंदोलन में जुटे रहे,
कहो कौन थे जो बदमाशी करने खातिर डटे रहे,
निश्चित ही जो देशद्रोह के कर्तृत्वों में शामिल थे,
उनको खास विभाजनकारी नित्य समर्थन हासिल थे,

नवल दीप पा चींटों के भी पंख निकलते देख रहा हूँ।।
लाल किले के चिर प्राचीर से रक्त उबलते देख रहा हूँ।।

इसीलिए वे देशद्रोह के आयामों से डरे नही,
संप्रभुता को खंडित करनें के कामों से डरे नहीं,
जिसका सीधा लाभ मिल रहा केवल गोरख धंधों को,
राष्ट्र धर्म को गौण समझने वालों के संबंधों को,
जाग्रत हो कर देश राग के अनुबंधों से जुड़ना होगा,
सतर्क होकर घर के भेदी से निश्चय ही भिड़ना होगा,
बिन अटके बिन भटके घर की रीति प्रीति ना खोओ तुम,
क्षणिक लोभ ना पालो मन में अपनों को संजोओ तुम,
बेटी बेटों में कोई आदर्श भरा उत्कर्ष भरो,
निश्चय ही जो समाधान हो वहीं अथक संघर्ष करो,
देशप्रेम से विमुख सोच को सम्मानित ना होने दो,
और राष्ट्र के गौरव ध्वज को अपमानित ना होने दो,

त्याग तपस्या के जीवन को आग में जलते देख रहा हूँ।।
लाल किले की चिर प्राचीर से रक्त उबलते देख रहा हूँ।।

पढ़िए :- हरि सिंह नलवा पर कविता | Poem On Hari Singh Nalwa


रचनाकार का परिचय

जितेंद्र कुमार यादव

नाम – जितेंद्र कुमार यादव

धाम – अतरौरा केराकत जौनपुर उत्तरप्रदेश

स्थाई धाम – जोगेश्वरी पश्चिम मुंबई
शिक्षा – स्नातक

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