माँ बहू पर कविता :- माँ के जीवन में | Maa Bahu Par Kavita

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माँ बहू पर कविता

माँ बहू पर कविता

माँ के जीवन में, वह दिन आता है।
प्रतीक्षा जिसकी, वर्षों से होती है।
पति की सारी, जीवन की पूंजी से,
निज बच्चों के, व्याह में खोती है।
बहु के साथ, बेटे के भविष्य हित,
कितने ही सपने, संजाने लगती है।
बच्चों की खुशियों, की खातिर ही,
हरदम कोशिश, में लगी रहती है।

कुछ क्षण खुशियाँ, देकर घर की,
बहु की तस्वीर, बदल सी जाती है।
कुछ दिन हंसी-खुशी गुजारकर,
अपने वास्तविक, रंग दिखाती है।
सीना हो जाता है,छलनी-छलनी,
जब माँ की गलतियां, बीनती है।
क्या गुजरती, होगी उस माँ पर,
जिसका बेटा, उससे छीनती है।

दया का न है कुछ,भाव बहू को,
जो माँ पर, अत्याचार करती है।
बेटे को माँ से, अलग करने हित,
भाँति- भाँति के, खेल रचती है।
कभी खुलकर, बहू भी,सास को,
अपनी व्यथा ही, नहीं बताती है।
बस छोड़कर, माँ का आँचल ही,
नया बसेरा, शहर में बनवाती है।

क्यूँ भूल जाती हैं, बहूएं यह कि,
सास भी किसी की, माँ होती हैं।
उसकी ममता के, बिन दुनियाँ में,
नहीं चैन की कहीं, छाँव होती है।
आज की बहूएं भी, कल अवश्य,
अपने बेटों की, सास बनती है।
फिर जैसे थे बोये, बीज जिसने,
वैसी ही उसकी, फसल उगती है।

पश्चाताप की, अग्नि में तब फिर,
बहू अंतर्मन में, अपने जलती है।
जब खुद की, औलादों का उनसे,
अपरिचित, व्यवहार वो सहती हैं।
तब पछतावा, करती बहुएं जब,
अपनी सास को, याद करती है।
काश कर लेते, हम सेवा तब तक
जब तक माँ, दुनियाँ में रहती है।

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हरीश चमोली

मेरा नाम हरीश चमोली है और मैं उत्तराखंड के टेहरी गढ़वाल जिले का रहें वाला एक छोटा सा कवि ह्रदयी व्यक्ति हूँ। बचपन से ही मुझे लिखने का शौक है और मैं अपनी सकारात्मक सोच से देश, समाज और हिंदी के लिए कुछ करना चाहता हूँ। जीवन के किसी पड़ाव पर कभी किसी मंच पर बोलने का मौका मिले तो ये मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

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