आप पढ़ रहे हैं हिंदी कविता मेरे मन की यह अभिलाषा ( Meri Abhilasha Hindi Poem ) :-

Meri Abhilasha Hindi Poem
मेरे मन की यह अभिलाषा

Meri Abhilasha Hindi Poem

हे गिरधर गोपाल, आप हो संकट नाशा।
ना मैं बुरा सोचूं ना बुरा करूं, मेरे मन की यह अभिलाषा।

मन वचन कर्म से, किसी का ना हो अहित।
सदा करूं सबकी सेवा, मन में रहे हमेशा परहित।

सच्चे मन से करूं कर्म, न दूं कभी किसी को झांसा।
निर्मल व पाक रहूं, मेरे मन की‌ ये अभिलाषा।

परोपकार करना ही बने, जीवन का अंतिम लक्ष्य।
बिना अंह के करूं निरंतर, नही देना पड़े कोई साक्ष्य।

सादा जीवन उच्च विचार, सबका हो कल्याण।
यह सोच बनी रहे, सुखी हो सबके प्राण।

मनुष्य जीवन है दुर्लभ, कठिन तपस्या से पाया।
निस्वार्थ करके सबकी सेवा, आवागमन से मुक्त हो काया।

अभिमान से नही, स्वाभिमान से जिऊं जीवन।
दूसरों के दर्द को, अपना समझूं आजीवन।

हे गिरधर गोपाल, तुम्ही पर है विश्वासा।
परहित हो धर्म मेरा,मेरे मन की यह अभिलाषा।

निर्मल व पाक मन में ही, होता है ईश्वर का वासा।
परोपकार करते मिले मुक्ति,मेरे मन की यह अभिलाषा।

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रचनाकार का परिचय

हंसराज "हंस"

हंसराज “हंस” जी गत 30 वर्षो से अध्यापन का कार्य करवा रहे है। शिक्षा मे नवाचारों के पक्षधर है। “हैप्पी बर्थडे” “गांव का अखबार” इनके शैक्षिक नवाचार है। शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशालाओं में संदर्भ व्यक्ति ( रिसोर्स पर्सन ) के रूप में 8-10 वर्षों का अनुभव रखते है। तात्कालिक मुद्दों, जयंतियों व सामाजिक कुरीतियों पर आलेख लिखते रहते।

मौलिक लेख विभिन्न सामाजिक, धार्मिक व देश व प्रदेश की पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। इसके साथ ही न्यूज पोर्टल व सोशल मीडिया के माध्यम से भी कई वेबीनारो व फेसबुक लाइव प्रसारण पर विभिन्न मंचों के माध्यम से अपने मौलिक विचारों का प्रकटीकरण करते रहते है। शिक्षक संगठन व सामाजिक संगठनों में विभिन्न दायित्वों का निर्वाह करते हुए निरंतर सामाजिक सुधारों की ओर अग्रसर है।

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